नक्षत्र विज्ञान

अश्विनी नक्षत्र

भारतीय वैदिक ज्योतिष की गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले 27 नक्षत्रों में से अश्विनी को पहला नक्षत्र माना जाता है। घोड़े के सिर को अश्विनी नक्षत्र का प्रतीक चिह्न माना जाता है जो इस नक्षत्र को घोड़े के बहुत से गुणों के साथ जोड़ता है। उदाहरण के लिए घोड़े को यात्रा का प्रतीक माना जाता है तथा यात्रा अपने आप में किसी प्रकार के आरंभ का प्रतीक मानी जाती है। इसलिए अधिकतर वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्विनी नक्षत्र का किसी न किसी प्रकार की यात्रा तथा किसी न किसी प्रकार की घटना के आरंभ से सीधा रिश्ता है। इसी प्रकार घोड़ा अपने साहस, गति तथा शक्ति के लिए भी जाना जाता है तथा घोड़े के यह गुण भी अश्विनी नक्षत्र के जातकों में सामान्यता ही पाये जाते हैं। घोड़ा अपनी जिद तथा अड़ियल स्वभाव के लिये भी जाना जाता है तथा घोड़े का यह गुण भी अश्विनी नक्षत्र के माध्यम से व्यवहार में आता है जिसके चलते अश्विनी नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक सामान्यतया जिद्दी अथवा अड़ियल स्वभाव के होते हैं तथा इनसे काम निकलवाना कई बार उसी प्रकार से मुश्किल हो जाता है जिस प्रकार किसी अड़ियल घोड़े को सधा कर उस पर सवारी करना। अश्विनी नक्षत्र अपने आप में एक बहुत विलक्षण नक्षत्र है तथा इसके जातक भी बहुत से विलक्षण गुणों के स्वामी होते हैं तथा कुंडली के अच्छा होने की स्थिति में ऐसे जातक अपने जीवन में बहुत से विलक्षण कार्य कर जाते हैं।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्विनी कुमारों को अश्विनी नक्षत्र का देवता माना जाता है। अश्विनी कुमारों को सूर्य देव के पुत्र माना जाता है तथा वैदिक ग्रंथों के अनुसार अश्विनी कुमार चिकित्सा शास्त्र के पूर्ण ज्ञाता हैं जिसके चलते इन्होनें च्यवन ॠषि को वृद्धावस्था से मुक्त करके पुन: युवा बना दिया था। वैदिक ग्रंथों के अनुसार अश्विनी कुमार स्वभाव से उदार, दूसरों की सहायता को तत्पर रहने वाले तथा स्थान स्थान पर घूमते रहने वाले स्वभाव के हैं तथा अश्विनी कुमारों के चरित्र की यह विशेषताएं अश्विनी नक्षत्र के माध्यम से साकार रुप प्राप्त करती हैं जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव मे आने वाले जातकों में भी उपर वर्णित विशेषताएं पायीं जातीं हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार नवग्रहों में से केतु को अश्विनी नक्षत्र का स्वामी ग्रह माना जाता है तथा केतु के चरित्र की बहुत सी विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से साकार रुप प्राप्त करती हैं। उदाहरण के लिए केतु को किसी प्रकार के आरंभ के साथ जुड़ा हुआ ग्रह माना जाता है तथा इसी प्रकार अश्विनी को भी आरंभ के साथ जुड़ा हुआ नक्षत्र माना जाता है बल्कि अश्विनी तो प्रथम नक्षत्र होने के कारण अपने आप में नक्षत्रों का ही आरंभ दर्शाता है। वैदिक ज्योतिष में केतु को कई प्रकार के चिकित्सा पद्धतियों के साथ जोड़ा जाता है तथा अश्विनी का भी चिकित्सा क्षेत्र के साथ गहरा संबंध है। इस प्रकार केतु की बहुत सी विशेषताएं इस ग्रह के प्रभाव में आने के कारण अश्विनी नक्षत्र में भी देखीं जातीं हैं।

अश्विनी नक्षत्र के सभी चार चरण मेष राशि में ही स्थित होते हैं जिसके कारण मेष राशि तथा इस राशि के स्वामी मंगल का भी इस नक्षत्र पर प्रभाव रहता है तथा मेष राशि एवम मंगल ग्रह की कई विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से साकार होती हैं। मंगल ग्रह के प्रभाव के चलते अश्विनी नक्षत्र में साहस तथा शौर्य जैसी विशेषताएं आ जातीं हैं तथा मेष राशि का अग्नि तत्व अश्विनी को तेज गति से कार्य करने की उर्जा प्रदान करता है। इस प्रकार विभिन्न प्रकार की शक्तियों के प्रभाव में आने के फलस्वरूप अश्विनी इन सभी शक्तियों की विशेषताओं का मिश्रित रूप प्रदर्शित करता है जिसके चलते इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों में उपर बताईं गईं विशेषताओं में से बहुत सी विशेषताएं पायीं जातीं हैं। अश्विनी के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक अपने कार्यों को शीघ्रता से आरंभ कर देने में विश्वास रखते हैं तथा इन जातकों को किसी भी प्रकार के कार्य को आरंभ करने से पूर्व प्रतीक्षा करना सामान्यतया बिल्कुल भी पसंद नहीं होता। अश्विनी के जातक समय को व्यर्थ गंवाना बिलकुल भी पसंद नहीं करते तथा गति एवम सपष्टवादिता इन जातकों की मुख्य विशेषताएं होती हैं। अपनी तेज गति तथा नया कार्य करने की विशेषता के कारण अश्विनी जातक कई प्रकार के नए व्यवसाय करने में, नए अविष्कार करने में, नईं खोजें करने में तथा नए प्रयोग करने में प्रत्येक प्रकार के नक्षत्र के जातकों से कई कदम आगे रहते हैं। बातचीत में अश्विनी के जातक बहुत सपष्टवादी होते हैं ऐसे जातक सामान्यतया किसी प्रकार की भूमिका बांधने में समय नष्ट करना पसंद नहीं करते तथा बिना समय गंवाएं सामने वाले व्यक्ति से अपने मन की बात कह देते हैं। अश्विनी जातकों की इस आदत के चलते कई बार सुनने वाला व्यक्ति आहत हो जाता है जिसके चलते इन जातकों को कई बार अशिष्ट अथवा रुखा भी कहा जाता है किन्तु अश्विनी जातक अपने बारे में की जाने वाली ऐसी बातों की तनिक भी चिंता नहीं करते तथा अपने स्वभाव के अनुसार कार्य करते रहते हैं।

अश्विनी जातक सामान्यतया किसी भी कार्य को करने में बहुत शीघ्रता दिखाते हैं जिसके चलते कई बार ऐसे जातक किसी प्रकार की हानि भी उठाते हैं किन्तु साथ ही साथ अश्विनी जातक अन्य कई नक्षत्रों के जातकों की तुलना में अधिक बुद्धिमान भी होते हैं जिसके चलते इन्हें तथ्यों को समझने में अधिक समय नहीं लगता जिससे यह किसी कार्य को शीघ्रता से कर लेने की क्षमता रखते हैं। कुंडली मे अश्विनी नक्षत्र के प्रभाव वाले जातक आम तौर पर अपनी आयु से कम ही दिखते हैं तथा बड़ी आयु में जाकर भी ऐसे जातक अन्य जातकों की तुलना में युवा दिखाई देते हैं। बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्विनी कुमारों का अपनी आयु से युवा दिखने का कारण अश्विनी कुमारों का इस नक्षत्र पर प्रभाव है। वैदिक ग्रंथों के अनुसार अश्विनी कुमार चिर युवा रहने वाले देवता हैं तथा इनके प्रभाव में आने के कारण अश्विनी के जातक भी अपनी आयु की तुलना में युवा दिखाई देते हैं। कुंडली में अश्विनी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव वाले जातक सामान्यतया बुद्धिमान, जीवन जीने की कला को जानने वाले, मोहक तथा आकर्षक होते हैं तथा इनका जीवन को जीने का अपना ही एक ढंग होता है। अश्विनी जातकों को रोमांच से भरपूर नए काम करने का तथा रोमांच से भरपूर खेल खेलने का शौक होता है तथा ऐसे जातक बहुत से रोमांचकारी खेलों में हिस्सा लेते हैं। इन जातकों को सामान्यतया खतरों से खेलने का शौक होता है तथा ऐसे जातक नई से नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तत्पर रहते हैं तथा अपने इस खतरों से खेलने के शौक के चलते कई बार ये जातक अपने आप को मुसीबत में भी डाल लेते हैं किन्तु मुसीबतें झेलने के बाद भी सामान्यतया ऐसे जातक खतरों से खेलना नहीं छोड़ते। कुंडली में अश्विनी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक को मिलनसार बना देता है तथा ऐसे जातक बातचीत करने की कला में भी अच्छे होते हैं जिसके चलते लोग इनके साथ तथा इनकी संगत में रहना पसंद करते हैं।

कुंडली में अश्विनी नक्षत्र के प्रबले प्रभाव के कारण जातक कई प्रकार की नकारत्मक प्रवृतियों का आदी भी हो जाता है। उदाहरण के लिए अश्विनी के प्रबल प्रभाव में आने वाले अधिकतर जातक प्रत्येक कार्य को शीघ्र से शीघ्र करने की कोशिश में रहते हैं तथा अपनी इस आदत के चलते ऐसे जातक बहुत से ऐसे कार्यों को करने में सक्षम नहीं होते जिन्हें करने के लिए धैर्य तथा सहनशीलता की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि धैर्य तथा सहनशीलता आम तौर पर अश्विनी जातकों के पास बिल्कुल भी नहीं होते। अश्विनी के जातक अधिकतर स्थितियों में शीघ्र परिणामों की अपेक्षा रखते हैं तथा शीघ्र परिणाम प्राप्त न होने की स्थिति में आम तौर पर ये जातक कार्य को अधूरा ही छोड़ देते हैं तथा किसी अन्य कार्य में अपना ध्यान लगा देते हैं। अपनी इस आदत के चलते कई अश्विनी जातक जीवन भर अपने व्यवसाय बदलते रहते हैं तथा जिस भी किसी व्यवसाय से इन्हें कुछ समय तक सकारात्मक परिणाम प्राप्त नहीं होते, ये उस व्यवसाय को छोड़ कर नए व्यवसाय की खोज में लग जाते हैं। इसलिए बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि कुंडली में अश्विनी के प्रबल प्रभाव वाले जातकों को अपने जीवन में धैर्य तथा सहनशीलता सीखना बहुत आवश्यक है तथा जो अश्विनी जातक अपने भीतर इन गुणों का विकास कर लेने में सक्षम हो जाते हैं वे अपने जीवन में बहुत सफल हो जाते हैं।

कुंडली में अश्विनी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक को जिद्दी अथवा बहुत जिद्दी भी बना सकता है जिसके चलते ऐसे जातक एक बार जो निर्णय ले लेते हैं, उसे बदल पाना बहुत कठिन हो जाता है तथा अपनी इस जिद के कारण ये जातक जीवन में कई बार भारी हानि उठाते हैं। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि अश्विनी नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह घोड़े का सिर यह दर्शाता है कि इस नक्षत्र का घोड़े के गुणों के साथ गहरा संबंध है तथा जिद्दी होना घोड़े के स्वभाव का एक विशेष गुण है जो अश्विनी के जातकों में भी आ जाता है जिसके चलते अश्विनी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों से इनकी जिद के विपरीत कोई कार्य करवाना वैसे ही कठिन हो जाता है जैसे किसी अड़ियल घोड़े को बस में करना। अपनी इसी आदत के चलते अश्विनी के जातक जीवन में बहुत बार अपने सबसे बड़े शुभचिंतकों की सलाह भी नहीं मानते जिसके चलते इन्हें अपने जीवन में कई बार बहुत भारी हानि भी उठानी पड़ती है। किन्तु अपने जीवन में बार बार हानि उठाने के बाद भी अधिकतर अश्विनी जातक अपनी गलतियों से सीख नहीं लेते तथा अपने स्वभाव की कमियों को दूर करने का प्रयास नहीं करते। जो अश्विनी जातक अपने स्वभाव में आवश्यक परिवर्तन लाने में सक्षम हो जाते हैं वे दूसरे अश्विनी जातकों की तुलना में जीवन के अधिकतर क्षेत्रों में अधिक सफल देखे जाते हैं।

आइए अब चर्चा करते हैं अश्विनी नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों की जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग में लायी जानी वाली गुण मिलान की प्रणाली में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्विनी को पुरुष नक्षत्र माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस लिंग निर्धारण का कारण अश्विनी के उपर अश्विनी कुमारों, केतु तथा मंगल का प्रभाव मानते हैं क्योंकि ये सभी के सभी ग्रह तथा देव पुरुष लिंग के ही हैं। वैदिक ज्योतिष में अश्विनी को वर्ण से वैश्य माना जाता है जिसका कारण कुछ विद्वान इस नक्षत्र का व्यापार क्षेत्र के साथ जुड़ा होना मानते हैं। वैदिक ज्योतिष अश्विनी नक्षत्र को गण में देव तथा गुण में सात्विक मानता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी अश्विनी नक्षत्र के इस गण तथा गुण निर्धारण का कारण इसके देवता अश्विनी कुमारों को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अश्विनी नक्षत्र पंच तत्वों में से पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।

भरणी नक्षत्र

भारतीय वैदिक ज्योतिष की गणनाओं के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले सताइस नक्षत्रों में से भरणी को दूसरा नक्षत्र माना जाता है। भरणी का शाब्दिक अर्थ भरण-पोषण करना है तथा कुछ वैदिक ज्योतिषी इस भरण पोषण का अभिप्राय प्रजनन के समय होने वाले बच्चे के भरण पोषण को मानते हैं तथा इन वैदिक ज्योतिषियों की इस मान्यता के पीछे छिपे कारण को समझने के लिए भरणी नक्षत्र के प्रतीक चिन्ह को समझना आवश्यक है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार स्त्री के प्रजनन अंग अर्थात योनि को भरणी नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह माना जाता है तथा इस प्रतीक चिन्ह को जानने के पश्चात भरणी के शाब्दिक अर्थ की उपर की गई व्याख्या को समझना कठिन नहीं रह जाता। जैसा कि हम जानते हैं कि पृथ्वी लोक पर जन्म लेने वाले सभी मनुष्य योनि के माध्यम से ही जन्म लेते हैं इसलिए बहुत से वैदिक ज्योतिषी भरणी नक्षत्र का रचनात्मकता के साथ गहरा संबंध मानते हैं क्योंकि मनुष्य का जन्म अपने आप में सृष्टि की रचनात्मकता का सबसे बड़ा उदाहरण है। इस प्रकार भरणी नक्षत्र अपने इस प्रतीक चिन्ह के माध्यम से रचनात्मकता तथ स्त्री जाती में पायी जाने वाली अन्य कई विशेषताओं के साथ जुड़ जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार यमराज को भरणी नक्षत्र का देवता माना जाता है जिसके चलते यह नक्षत्र यमराज के प्रभाव में भी आता है। यमराज को धर्मराज का नाम भी दिया जाता है तथा प्राणियों के कर्मों के अनुसार उनके अगले जन्म के लिए उचित समय, स्थान तथा स्थितियों का निर्णय करना भी यमराज के कार्यक्षेत्र में आता है। इस प्रकार प्राणियों की मृत्यु तथा मृत्यु के पश्चात उनके कर्मों के आधार पर उन्हें मिलने वाला दूसरा जीवन, ये दोनों ही कार्य यमराज के कार्यक्षेत्र में आते हैं।

बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि जिस प्रकार जीव की मृत्यु से लेकर उसके नवजीवन तक तथा जीवन से पुन: मृत्यु तक प्रयोग में आने वाली यमराज की कार्यशाली सदा माया में घिरी रहती है, उसी प्रकार भरणी नक्षत्र का भी माया के साथ गहरा संबंध है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार देवी महाकाली को भी भरणी नक्षत्र की देवी माना जाता है जिसके चलते इस नक्षत्र की कार्यशैली में देवी महाकाली के गुणों का प्रभाव भी देखने में आता है। जिस प्रकार देवी महाकाली भीषण से भीषण शत्रु का भी सहज ही संहार करने में सक्षम है तथा सृष्टि के दुष्कर से दुष्कर कार्य भी उनके लिए सहज हैं, उसी प्रकार भरणी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भी कठिन से कठिन कार्य से भी नहीं चिंतित होते तथा इन कार्यों को बिना विचलित हुए करने का प्रयास करते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार शुक्र को भरणी नक्षत्र का स्वामी ग्रह माना जाता है तथा इसी के अनुसार शुक्र ग्रह की बहुत सीं विशेषताएं भरणी नक्षत्र के माध्यम से साकार रुप प्राप्त करतीं हैं। वैदिक ज्योतिष में शुक्र को स्त्री जाती तथा प्रजनन के साथ जोड़ा जाता है तथा शुक्र की यह विशेषताएं भरणी नक्षत्र में भी पायीं जातीं हैं। इसके अतिरिक्त शुक्र ग्रह को रचनात्मकता के साथ भी जोड़ा जाता है तथा शुक्र की यह रचनात्मकता भी भरणी के माध्यम से प्रदर्शित होती है। भरणी नक्षत्र के सभी चरण मेष राशि में स्थित होते हैं जिसके चलते इस नक्षत्र पर मेष राशि तथा इसके स्वामीं मंगल ग्रह का प्रभाव भी देखने में आता है। इस प्रकार भरणी जन्म देने में सहायता करने वाले शुक्र से लेकर मृत्यु को निर्धारित करने वाले यमराज के प्रभाव में आता है तथा इसी कारण भरणी नक्षत्र का स्वभाव निश्चित कर पाना बहुत कठिन हो जाता है तथा बहुत बार इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक अपने जीवन में जन्म तथा मृत्यु के जैसीं विपरीत चरम सीमाओं को छूते दिखाई देते हैं।

अधिकतर वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि भरणी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले विभिन्न जातक एक दूसरे से बिल्कुल ही विपरीत स्वभाव के स्वामी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाला एक जातक बिल्कुल ही रचनात्मक प्रवृति का हो सकता है जबकि इसी नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाला दूसरा जातक बिल्कुल ही हिंसात्मक प्रवृति का हो सकता है। इसी प्रकार भरणी के प्रबल प्रभाव में आने वाले विभन्न जातक अति बुद्धिमान अथवा बिल्कुल ही मंद बुद्धि, बहुत पदार्थवादी अथवा बिल्कुल ही तटसथ हो सकते हैं। इसी अतिरेक के चलते भरणी नक्षत्र के जातक अपने जीवन में कई बार ऐसी चरम सीमाओं को छूते हैं जो एक दूसरे से बिल्कुल ही विपरीत होती हैं तथा किसी कुंडली में भरणी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक को अपने जीवन काल में कई बार बहुत बड़े उतार-चढ़ावों का सामना करवा सकता है जिसके चलते कई बार तो ऐसे जातकों का जीवन एक तेज चलते झूले की तरह हो जाता है जो कभी बहुत वेग से एक छोर की ओर चला जाता है तो कभी उतने ही वेग से दूसरे छोर की ओर। भरणी जातकों के जीवन में बार बार आने वाली अनिश्चितता की यह स्थिति इनके जीवन के व्यवसायिक, शारीरिक, मानसिक तथा अन्य कई प्रकार के क्षेत्रों पर अपना प्रभाव डालती है।

कुंडली में भरणी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक के व्यक्तित्व को बल प्रदान करता है जिसके चलते भरणी के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक सामान्यतया अपने जीवन में आने वाली बड़ी से बड़ी कठिनाई से भी नहीं विचलित होते तथा ऐसे जातक बहुत बड़ी हानी उठाने के पश्चात भी शीघ्र ही संभल जाते हैं तथा पुन: अपने प्रयासों को आरंभ कर देते हैं। अपने चरित्र की इसी विशेषता के चलते भरणी के जातक अपने जीवन में कई बार विफल होने के पश्चात भी हार नहीं मानते तथा अविचलित भाव से अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयास करते रहते हैं जिसके कारण ऐसे जातक अतत: अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेने में बहुत बार सफल भी हो जाते हैं। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि भरणी के प्रबल प्रभाव में आने वाले अधिकतर जातकों के लिए प्रयास करना मह्त्वपूर्ण होता है तथा ये जातक सफलता या असफलता को बहुत महत्व नहीं देते। शुक्र के प्रभाव में आने के कारण भरणी के जातकों में सामान्यतया किसी न किसी प्रकार की रचनातक प्रवृति भी प्रबल रहती है जिसके चलते ऐसे जातक रचनात्मक क्षेत्रों में सफल देखे जा सकते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार भरणी नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक कई प्रकार के व्यवसायिक क्षेत्रों में कार्यशील पाए जा सकते हैं जैसे कि छोटे बच्चों से संबंधित व्यवासायों मे लगे लोग, शिशु की देखभाल करने वाली आया, नर्स, दाई, शिशु का जन्म करवाने में सहायता करने वाली चिकित्सक, छोटे बच्चों को पढ़ाने वाले अध्यापक तथा अध्यापिकाएं तथा बच्चों से जुड़े व्यवसायों में काम करने वाले अन्य लोग, मृत्यु के पश्चात की जाने वाली प्रथाओं से जुड़े लोग जैसे कि शमशान भूमि में कार्य करने वाले लोग, समाचार पत्रों में मृतकों के बारे में समाचार प्रकाशित करने वाले लोग, मृत्यु की जांच करने वाले जासूस तथा इसी प्रकार के लोग तथा अन्य कई प्रकार के रचनात्मक तथा विनाशकारी कार्यों को करने वाले लोग जिनमें कलाकारों से लेकर हथियारों का व्यापार करने वाले संगठन तथा इनमें काम करने वाले लोग, आतंकवादी संगठनो से जुड़े लोग तथा अन्य कई प्रकार के व्यवसायों से जुड़े लोग भी शामिल हैं।

आइए अब चर्चा करते हैं भरणी नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों के बारे में जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग में लायी जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार भरणी नक्षत्र को एक स्त्री नक्षत्र माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिष भरणी नक्षत्र के इस लिंग निर्धारण का कारण इस नक्षत्र का बहुत सी स्त्री शक्तियों के साथ जुड़ा होना मानते हैं जिनमें इस नक्षत्र का प्रतीक चिन्ह योनि, इस नक्षत्र का स्वामी ग्रह शुक्र तथा इस नक्षत्र से जुड़ी देवी महाकाली भी शामिल हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार भरणी नक्षत्र को शूद्र वर्ण प्रदान किया जाता है जिसका कारण इस नक्षत्र की अनियंत्रित विनाशकारी शक्ति को माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार भरणी को गण से मानव माना जाता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिष इस नक्षत्र से जुड़ी रचनात्मकता तथा सृजन करने की प्रबल अभिलाषा को मानते हैं। वैदिक ज्योतिष भरणी नक्षत्र को गुण से राजसिक मानता है तथा भरणी का यह गुण निर्धारण भी इस नक्षत्र के गण निर्धारण की भांति ही समझा जा सकता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार भरणी नक्षत्र पंच तत्वों में से पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।

कृतिका

वैदिक ज्योतिष के अनुसार श्री कार्तिकय को कृतिका नक्षत्र का देवता माना जाता है जिसके चलते इस नक्षत्र पर शिव पुत्र श्री कार्तिकेय का भी प्रबल प्रभाव रहता है तथा उनके कई गुण एवम विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं। श्री कार्तिकेय के युद्ध कौशल की विशेषताएं, उनकी विनम्रता, उनकी तीव्र बुद्धि तथा अन्य कई विशेषताएं इस नक्षत्र के माध्यम से साकार रुप प्राप्त करती हैं जिनके चलते कृतिका नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले बहुत से जातक सैन्य कला में कुशल देखे जाते हैं क्योंकि शिव पुत्र श्री कार्तिकेय स्वयम इस कला मे निपुण थे तथा वे तारकासुर के साथ निर्णायक युद्ध करने वाली देव सेना के सेनापति भी थे। वैदिक ज्योतिष के अनुसार अग्नि देव को भी कृतिका नक्षत्र का देवता माना जाता है जिसके कारण यह नक्षत्र अग्नि देव के प्रभाव में भी आ जाता है। वैदिक ज्योतिष में सूर्य को कृतिका नक्षत्र का स्वामी ग्रह माना जाता है तथा इस कारण सूर्य का भी इस नक्षत्र पर प्रबल प्रभाव रहता है। अग्नि देव के अग्नि तत्व तथा सूर्य की आग्नेय उर्जा के प्रभाव में आने के कारण इस नक्षत्र में अग्नि तत्व तथा उर्जा की मात्रा भरपूर रहती है जिसके कारण इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातकों में भी उर्जा की मात्रा सामान्य से अधिक ही रहती है। सूर्य को नवग्रहों का राजा माना जाता है तथा सूर्य को युद्ध कला में भी निपुण माना जाता है तथा सूर्य की युद्ध कला की विशेषताएं भी इसी नक्षत्र के माध्यम से प्रदर्शित होतीं हैं जिसके कारण इस नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक युद्ध क्षेत्र से जुड़े व्यवसायों में कार्यशील देखे जाते हैं। कृतिका नक्षत्र का पहला चरण मेष राशि में आता है जबकि इस नक्षत्र के शेष तीन चरण वृष राशि में आते हैं जिसके कारण कृतिका नक्षत्र पर इन राशियों का तथा इनके स्वामी ग्रहों मंगल तथा शुक्र का प्रभाव भी पड़ता है।

कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि मेष राशि में स्थित होने वाले कृतिका नक्षत्र के पहले चरण के प्रभाव में आने वाले जातकों की युद्ध कला तथा युद्ध से जुड़े कार्यों में रुचि उन जातकों की अपेक्षा बहुत अधिक रहती है जो कृतिका नक्षत्र के वृष राशि में स्थित होने वाले तीन चरणों में से किसी एक चरण के प्रभाव में होते हैं। इस धारणा का कारण यह माना जाता है कि मेष राशि तथा इसके स्वामी मंगल ग्रह, दोनों को ही वैदिक ज्योतिष में अग्नि तत्व से जोड़ा जाता है तथा मंगल ग्रह को वैदिक ज्योतिष में शौर्य, पराक्रम तथा युद्ध कला के साथ भी जोड़ा जाता है जबकि वृष राशि को वैदिक ज्योतिष में पृथ्वी तत्व से जुड़ी एक सौम्य राशि माना जाता है तथा शुक्र ग्रह को वैदिक ज्योतिष में युद्ध कला के साथ न जोड़ कर रचनात्मकता तथा सुंदरता के साथ जोड़ा जाता है जिसके कारण वृष राशि तथा शुक्र ग्रह के प्रभाव में आने वाले कृतिका नक्षत्र के अंतिम तीन चरणों पर रचनात्मकता तथा सृजन का प्रभाव युद्ध से कहीं अधिक रहता है। इसी कारण कृतिका नक्षत्र के अंतिम तीन चरणों के प्रभाव में आने वाले जातकों की युद्धक प्रवृति सामान्यतया नियंत्रण में रहती है तथा ऐसे जातक सीधे रुप से युद्ध से जुड़े व्यवसायों को न चुनकर ऐसे कार्यक्षेत्रों को चुनते हैं जिनमें इन्हें अपनी रचनात्मक प्रवृति का प्रदर्शन करने का भरपूर अवसर मिले। कृतिका नक्षत्र पर विभिन्न प्रकार की शक्तियों का प्रभाव होने के कारण इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक भी एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न हो सकते हैं तथा किसी कुंडली में कृतिका के प्रभाव में आने वाले जातक का स्वभाव तय करने के लिए यह निश्चित करना आवश्यक हो जाता है कि कुंडली में कृतिका नक्षत्र पर सबसे अधिक प्रभाव उपर बताईं गईं शक्तियों में से किस शक्ति का है।

उदाहरण के लिए यदि किसी जातक की जन्म कुंडली में शुक्र ग्रह का प्रबल प्रभाव है तथा शुक्र कुंडली में पूर्ण रुप से बलशाली है तथा कुंडली में जातक पर कृतिका नक्षत्र का प्रभाव वृष राशि में स्थित होने के कारण है तो ऐसे जातक की किसी प्रकार की युद्ध कला से न जुड़कर किसी प्रकार के रचनात्मक कार्य से जुड़ने की संभावना बहुत अधिक रहती है जबकि इसके विपरीत कुंडली में शुक्र का प्रभाव तथा बल बहुत कम होने पर कृतिका नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक की रचनात्मक रुचि उतनी प्रबल नहीं देखी जाती। कृतिका नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक बहुत बुद्धिमान, तेजस्वी तथा प्रभावशाली होते हैं तथा इस नक्षत्र का प्रभाव सामान्यतया जातक को स्वतंत्र विचारों तथा स्वतंत्र व्यक्तित्व का स्वामी बना देता है। कृतिका के जातक किसी भी कार्य, वस्तु अथवा रहस्य की जड़ तक पहुंचने के लिए तत्पर रहते हैं तथा इनकी विशलेषनात्मक शक्ति बहुत तीव्र होती है। कृतिका के प्रबल प्रभाव वाले जातक अपने काम समय पर तथा नियम से करना पसंद करते हैं तथा इन्हें प्रत्येक काम को बिल्कुल ठीक प्रकार से ही करने की आदत होती है तथा आधे अधूरे ढंग से काम करने वाले लोग इन्हें पसंद नहीं होते। कृतिका के जातक प्रत्येक कार्य, वस्तु तथा व्यक्ति में कमियां निकालने में बहुत निपुण होते हैं तथा अपनी इसी विशेषता के कारण इस नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातक बहुत अच्छे आलोचक बनने में सक्षम होते हैं। बातचीत तथा व्यवाहर में आम तौर पर कृतिका के जातक बहुत सभ्य होते हैं तथा ऐसे जातक शिष्टाचार का विशेष ध्यान रखने वाले होते हैं। कृतिका के प्रबल प्रभाव में आने वाले जातकों की शिक्षा प्राप्त करने में भी बहुत रुचि रहती है तथा इनमें से कई जातक उच्च शिक्षा प्राप्त करके विभिन्न प्रकार के कार्यक्षेत्रों में नाम कमाते हैं।

आइए अब चर्चा करते हैं कृतिका नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों की जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्य के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कृतिका नक्षत्र को एक स्त्री नक्षत्र माना जाता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र पर कृतिकाओं का प्रभाव मानते हैं। वैदिक ज्योतिष में कृतिका नक्षत्र को ब्राहमण वर्ण प्रदान किया जाता है जिसकी व्याख्या बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र की कार्यशैली के आधार पर करते हैं क्योंकि कृतिका नक्षत्र के प्रबल प्रभाव में आने वाले अधिकतर जातक जन कल्याण के लिए ही कार्य करना पसंद करते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कृतिका नक्षत्र को राक्षस गण प्रदान किया जाता है जिसका कारण बहुत से वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र का किसी न किसी प्रकार से युद्ध के साथ जुड़ना मानते हैं। वैदिक ज्योतिष कृतिका नक्षत्र को राजसिक गुण प्रदान करता है तथा कृतिका नक्षत्र के इस गुण निर्धारण का कारण अधिकतर वैदिक ज्योतिषी इस नक्षत्र पर राजसिक ग्रह सूर्य का प्रभाव मानते हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार कृतिका नक्षत्र पंच तत्वों में से पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।

रोहिणी

इन सभी तथ्यों के कारण रोहिणी नक्षत्र पर बैल के गुणों का बहुत प्रभाव रहता है जिसके चलते इस नक्षत्र में बैल के सहज गुण जैसे कि परिश्रम करना, सहज स्वभाव का होना, दृढ़ इच्छा शक्ति का स्वामी होना तथा अन्य कई गुण भी पाए जाते हैं। बैलगाड़ी का प्रभाव होने के कारण रोहिणी नक्षत्र को व्यापार, कृषि उत्पादन, पशु पालन तथा अन्य ऐसी विशेषताओं के साथ भी जोड़ा जाता है। कुछ वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि बैलगाड़ी का चलना समय के पहिये का चलना भी माना जा सकता है तथा यहां इस पहिये के चलने का अर्थ विकास, उन्नति तथा सृजन से भी लिया जाता है जिसके कारण वैदिक ज्योतिष में रोहिणी को सृजन, विकास तथा उन्नति के साथ भी जोड़ा जाता है। शुक्र ग्रह का प्रभाव इस नक्षत्र में रचनात्मकता, सुंदरता तथा सृजन करने की शक्ति पैदा कर देता है जिसके कारण इस नक्षत्र में इन विशेषताओं की प्रबलता बढ़ जाती है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार त्रिदेवों में सृष्टि के जनक तथा रचियता भगवान ब्रह्मा जी को रोहिणी नक्षत्र के अधिपति देवता माना जाता है जिसके कारण इस नक्षत्र पर ब्रह्मा जी का भी प्रबल प्रभाव रहता है। ब्रहमा जी के प्रभाव में आने के कारण रोहिणी नक्षत्र में सृजन करने की प्रबल शक्ति आ जाती है तथा यह नक्षत्र वैदिक ज्योतिष के अनुसार प्रत्येक प्रकार के सृजन, उत्पादन, निर्माण तथ विकास को प्रोत्साहित करता है। रोहिणी नक्षत्र से जुड़ी अपार सुंदरता के विषय में जानने के लिए यहां पर भारतीय मिथिहास के एक प्रसंग की चर्चा करते हैं।

रोहिणी को भारतीय मिथिहास के अनुसार एक नक्षत्र कन्या माना जाता है तथा इसे ब्रह्मा जी की मानस पुत्री भी माना जाता है। कहा जाता है कि रोहिणी इतनी सुंदर थी कि इसे जन्म देने के पश्चात एक बार तो इसके जनक ब्रह्मा जी भी इसके उपर आसक्त होकर इसे पाने की कामना कर बैठे थे तथा बाद में भगवान शिव के हस्ताक्षेप के बाद ब्रहमा जी को रोहिणी के जन्म का मूल प्रयोजन याद आया था। रोहिणी आदि सताइस नक्षत्र कन्याओं को ब्रह्मा जी के मानस पुत्र प्रजापति दक्ष की कन्याएं माना जाता है जिनका विवाह चन्द्र देव के साथ हुआ था तथा निश्चित नियम के अनुसार चन्द्रमा को अपनी प्रत्येक पत्नि के साथ बारी बारी से एक एक दिन बिताना था किन्तु रोहिणी के रुप का सौंद्रय इतना मोहक था कि एक बार रोहिणी के पास जाने के पश्चात चन्द्रमा ने शेष किसी भी नक्षत्र कन्या के साथ समय बिताने से मना कर दिया था। इसके कारण विकट स्थिति पैदा हो गई थी क्योंकि सृष्टि के नियम के अनुसार चन्द्रमा को प्रत्येक नक्षत्र के साथ एक निश्चित समय के लिए रहना था। बाद में त्रिदेवों के हस्ताक्षेप से चन्द्रमा को शेष सभी नक्षत्र कन्याओं के साथ भी समय व्यतीत करने के लिये मनाया गया किन्तु यह सर्वविदित है कि चन्द्रमा की सभी पत्नियों में से रोहिणी ही उन्हें सबसे अधिक प्रिय है। इस प्रकार रोहिणी नक्षत्र को वैदिक ज्योतिष में सुंदरता, वैवाहिक सुख तथा सुखी दाम्पत्य जीवन के साथ भी जोड़ा जाता है।

वैदिक ज्योतिष के अनुसार चन्द्रमा को रोहिणी का स्वामी ग्रह माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी यह मानते हैं कि रोहिणी चन्द्रमा की सबसे प्रिय पत्नि होने के कारण चन्द्रमा अपने चरित्र के सर्वश्रेष्ठ गुणों की अभिवयक्ति इस नक्षत्र के माध्यम से करते हैं जिसके कारण रोहिणी नक्षत्र में चन्द्रमा के सहज गुण जैसे कि मातृत्व का गुण, सब प्राणियों को शीतलता प्रदान करने का गुण, सभी का कल्याण चाहने का गुण तथा ऐसे ही कई अन्य गुण भी पाए जाते हैं। रोहिणी नक्षत्र के प्रति चन्द्रमा का अगाढ़ प्रेम इस तथ्य से भी विदित होता है कि कुंडली में पायी जाने वाली सभी राशियों तथा सभी नक्षत्रों में से चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र में स्थित होकर ही अपने सर्वोच्च बल को प्राप्त करते हैं जिसके चलते रोहिणी में स्थित चन्द्रमा को वैदिक ज्योतिष में उच्च का चन्द्रमा भी कहा जाता है। कुंडली में रोहिणी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव जातक को अति सुंदर, आकर्षक तथा मनमोहक बना देता है तथा इनकी सुंदरता की मोहिनी के प्रभाव से बच पाना सामान्यतया किसी के लिए भी बहुत कठिन होता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री कृष्ण की जन्म कुंडली में लग्न तथा चन्द्रमा पर रोहिणी नक्षत्र का प्रबल प्रभाव था जिसके कारण भगवान श्री कृष्ण की मोहिनी विश्व विख्यात है तथा उनकी मोहिनी के आकर्षण में मनुष्य तो क्या, पशु पक्षी भी बंध जाते थे। रोहिणी के जातकों में विपरीत लिंग को आकर्षित करने की प्रबल क्षमता होती है तथा सामान्य तौर पर रोहिणी के अधिकतर जातक अपनी इस क्षमता को भली भांति समझते भी हैं तथा इनमे से बहुत से जातक अपनी इस क्षमता का प्रयोग अपने कई प्रकार के कार्य सिद्ध करने के लिए भी करते हैं।

रोहिणी के जातक सामान्यतया व्यवहार तथा वाणी से भी बहुत कुशल होते हैं तथा इन्हें लगभग किसी भी स्थिति को अपने अनुकूल बना लेने की कला आती है। अपनी व्यवहार कुशलता के चलते रोहिणी के जातक समाज में आदरणीय स्थान भी प्राप्त करते हैं तथा विकास एवम उन्नति की ओर अग्रसर रहते हैं। रोहिणी के जातकों में कृषि उत्पादन, रचनात्मक कार्यों तथा व्यापार की समझ भी बहुत अच्छी होती है जिसके चलते बहुत से रोहिणी जातक इन क्षेत्रों में सफल देखे जाते हैं। रोहिणी के जातक ऐसे बहुत से कार्यक्षेत्रों में भी सफल देखे जाते हैं जिनमें सफलता प्राप्त करने के लिए शारीरिक सुंदरता, आकर्षक व्यक्तित्व तथा मोहक अंदाज़ का होना आवश्यक होता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रोहिणी नक्षत्र के प्रभाव में आने वाले जातक कई प्रकार के व्यवसायिक क्षेत्रों में कार्यशील देखे जाते हैं जैसे कि कृषि उद्योग से जुड़े लोग, पशु पालन से जुड़े लोग, फैशन जगत से जुड़े लोग, सिनेमा जगत से जुड़े लोग तथा विशेषतया अपनी सुंदरता के बल पर दर्शकों को आकर्षित करने वाले अभिनेता तथा अभिनेत्रियां, मनोरंजन जगत से जुड़े लोग, सौंदर्य प्रसाधनों के उद्योग में कार्यशील लोग, फल तथा सब्जियों के व्यापार में कार्यशील लोग तथा बहुत से अन्य व्यवासायिक क्षेत्रों में कार्यशील लोग।

आइए अब अंत मे देखते हैं रोहिणी नक्षत्र से जुड़े कुछ अन्य तथ्यों को जिन्हें वैदिक ज्योतिष के अनुसार विवाह कार्यों के लिए प्रयोग की जाने वाली गुण मिलान की विधि में महत्वपूर्ण माना जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रोहिणी नक्षत्र को एक स्त्री नक्षत्र माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी रोहिणी नक्षत्र के इस लिंग निर्धारण को इस नक्षत्र पर चन्द्रमा तथा शुक्र जैसे स्त्री ग्रहों के प्रभाव के साथ जोड़कर देखते हैं । यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि रोहिणी नक्षत्र द्वारा प्रदर्शित की जाने वाली बहुत सी विशेषताएं जैसे कि रचनात्मकता, मातृत्व, सृजन करने की शक्ति तथा सुंदरता को भी वैदिक ज्योतिष के अनुसार पुरुषों से कहीं अधिक स्त्रियों के साथ ही जोड़ा जाता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रोहिणी को एक संतुलित नक्षत्र माना जाता है तथा इस नक्षत्र की कार्यशैली को देखते हुए इस निर्धारण को समझना आसान है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रोहिणी को एक स्थिर अथवा ध्रुव नक्षत्र माना जाता है तथा बहुत से वैदिक ज्योतिषी इसका कारण रोहिणी नक्षत्र पर बैल का प्रबल प्रभाव मानते हैं क्योंकि बैल स्वभाव से बहुत स्थिर होता है तथा अपने कार्य को निरंतर करता रहता है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रोहिणी को शूद्र वर्ण प्रदान किया जाता है तथा इतने शुभ तथा कल्याणकारी माने जाने वाले इस नक्षत्र के इस वर्ण निर्धारण के पीछे छिपा कोई ठोस कारण अभी तक वैदिक ज्योतिषी ढ़ूंढ़ नहीं पाए हैं। वैदिक ज्योतिष मे रोहिणी को गण से मानव माना जाता है तथा गुण से इस नक्षत्र को राजसिक माना जाता है तथा अधिकतर वैदिक ज्योतिषी रोहिणी नक्षत्र के इस गुण तथा गण निर्धारण का कारण इस नक्षत्र का पदार्थवाद तथा सृजन से जुड़ा होने को मानते हैं क्योंकि ये दोनों ही विशेषताएं मानवीय तथा राजसिक हैं। वैदिक ज्योतिष के अनुसार रोहिणी नक्षत्र को पंच तत्वों में से पृथ्वी तत्व के साथ जोड़ा जाता है।