मांगलिक दोष एक विवेचन

   जैसा कि हम जानते हैं मनुष्य प्रारम्भ् से ही स्वभाववश चेतनशील प्राणी रहा है। आदि काल से ही .क्या, कैसे,क्या हो रहा है, क्या होगा आदि बातों को जानने के लिए मनुष्य सदैव उत्सुक रहा है। फलस्वरूप यही जिज्ञासा मनुष्य को ज्योितष् शास़्त्र के गम्भीर रहस्योद्घाटन करने के लिए  प्रवृत किया।
सर्वप्रथम भारतीय विद्वानों ने आकाश रूपी प्रयोगशाला में ग्रह,नक्षत्र एवं तारों आदि के रहस्यों का पता लगाया। इस अन्वेष्ण् से समस्त जगत को अभूतपूर्व लाभ् प्राप्त हुआ। फलत: इस विद्या का नाम ज्योतिः शास्त्र रखा गया। कालान्तर में अनेक विद्वानों ने अनवरत् अन्वेषण कर इस ज्योितष् शास्त्र को पल्लवित आैर पुष्पित किया।
बीच के कालखंड में जब हमारा देश पराधीन हुआ तो इसका दुष्प्रभाव हमारे ज्योतिष शास्त्र  पर भी पड़ा। फलत: इस क्षेत्र में अनुसन्धान की गति थोड़ी धीमी पड़ गयी। परिणामतः हम जनक होते हुए भी पश्चिम की आेर मुखातिब होने लगे। तथापि इस काल में भी अनेकानेक विद्वानों ने इस विद्या रूपी ध्रोहर को आगे बढाने में अपना महती योगदान दिया।
जैसा कि हम जानतें हैं _ ज्योतिष शास्त्र पूर्णरूपेण ग्रह, नक्ष्त्रों,तारों एवं राशियों आदि पर आधारित है। ये स्वभावतः उग्र एवं मृदु होते हैं।
एक आेर सूर्य, मंगल एवं शनि उग्र स्वाभाव वाले होते है, तो वहीं दूसरी आेर चन्द्र ,शुक्र एवं  वृहस्पति मृदु संज्ञक होते हैं। यहां हम विवाह एवं दाम्पत्य जीवन पर पड़ने वाले  मंगल के प्रभाव की चर्चा करेंगे।
सर्वप्रथम मांगिलक दोष् क्या है _ यद्यपि आर्ष् ग्रंथों में मांगिलक दोष् नाम से कोइ योग वर्णित नहीं है। हां इससे मिलते जुलते योगों की चर्चा अवश्य की गयी है। वृहत्पाराशर के रचनाकार आचायर् पाराशर के अनुसार

लग्ने व्यये सुखे वापि सप्तमे वाष्टमे कुजे। शुभ दृग योग हीनो च  पतिं हन्ति न संशय:।।