मकर संक्रांति २०१५

मकर संक्रांति २०१५ इस बार १५ जनबरी को ही मनाई जाएगी —
संक्रान्ति काल में स्नान ध्यान और दान पुण्य को बढ़ता है , यह पुण्यकाल दिनभर रहेगा ! १४ जनबरी को सूर्य रात्रि ०१ बजकर ३० मिनट पर कर्क लग्न में मकर राशि में प्रवेश कर जायेंगे , इस दिन चंद्रमा तुला राशि में गोचर कर रहे हैं !राशि परिवर्तन का यह समय संक्रान्तिकाल कहलाता है ! सूर्य का अगले दो महीने तक अपनी शत्रु की राशि मकर और फिर १३ फरबरी से कुम्भ में गोचर होगा ! उधर शनि अपनी शत्रु की राशी वृश्चिक में गोचर कर रहे हैं ! दो तेजस्वी गृह शनि से प्रभावित होंगे ! लग्न में स्थित उच्च के गुरु की पांचवी द्रष्टि शनि पर , नवमीं द्रष्टि केतु पर और सातवी द्रष्टि सूर्य + शुक्र + बुध पर होगी ! कह सकते हैं गुरुवार से प्रारंभ वर्ष २०१५ गुरु के प्रभाव में १४ जुलाई २०१५ तक रहेगा ! आगे गुरु सिंह राशि में जायेंगे !
सूर्य अर्घ्य – मकर संक्रांति काल में भगवान् सूर्य को अर्घ्य अति महत्वपूर्ण और पूण्य फलदायी होता है ! यह प्रक्रिया आत्म बल को बढ़ाती है ! तिल के लड्डू लेकिन गुड से बने हुए दान करने का भी बड़ा महत्व है गुड सूर्य के और तिल्ली शनि के दोषों का परिमार्जन करती है ! सेवन करना भी लाभदायी है ! शनि वायु विकार देता है गुड तिल्ली इसे नष्ट करती है रेचक होता है यह आहार ! इस दिन सेमी की शब्जी खाने का बनाने का भी महत्व है कारण साफ़ है सेमी अति रेसेदार फल्ली होती है जो पेट को साफ़ करती है ! सूर्य किरणों का सेवन लाभदायी होता है इसीलिए इस दिन पिकनिक , सैर सपाटा किया जाता है ! बेर के फल ऋतूफल के रूप में खाए जाते हैं ! चढ़ाए जाते हैं , बांटे जाते हैं , गन्ने के टुकड़े बाँटने का भी रिवाज इसीलिए है !

खिचडी दान – मुंग , उड़द और चावल का मिश्रण खिचडी कहलाता है मूंग बुध का , उड़द शनि का और चावल शुक्र का दोष परिमार्जन करता है , प्रायः मकर संक्रांति को ये तीनों गृह एक साथ युति में होते हैं ! इस बार तो ये तीनों गृह शनि की तीसरी द्रष्टि में हैं , अतः खिचडी का दान और भोजन रूप में सेवन पुण्यफल के साथ साथ स्वाथ्यवर्धक भी होगा !
ऐसे करें स्नान – स्नान पूर्व सफ़ेद तिल्ली , चन्दन , बेसन के घोल से उबटन लगायें , जल में अनामिका अंगुली से स्वस्तिक की आकृति बनाएं यह काम नदी , बाल्टी , टब में किया जा सकता है , साबर स्नान में नहीं ! अतः कोसिस करें इस दिन बाल्टी में पानी लेकर पहला लोटा उक्त प्रक्रिया अपना कर ऊपर डालें फिर साबर ( फबारा ) से नाहन लें ! १- ॐ घं घ्रिणी सूर्याय नमः , २- ॐ सूर्य देव सहस्त्रान्सो तेजो राशे जगत्पते अनुकम्पय मां भक्त्या घ्रिह्नार्घ्यम दिवाकरः किसी एक मन्त्र से दोनों अंजली अथवा लोटे से अर्घ्य देवे !

ॐ शुभमस्तु